31.5.10

याद रखोगे, तो प्रगति करोगे...

1. मस्तिष्क एक चमत्कारी अंग है। यह आपके जन्म के बाद से लगातार काम करता है, जब तक कि आप प्रेम में ना पड़ जांए।


2. दिमाग में भी उतनी ही ताकत होती है, जितनी हाथों में, दुनिया थामने के लिए ही नहीं बल्कि उसे बदलने के लिए भी।

बस जरा सी कसर बाकी है

कुछ तो शर्म करो ऐ दुनिया वालों,


बस जरा सी कसर बाकी है,

अब इस दीये में और तेल नहीं,

बस जरा सी बाती बाकी है।

बुझ ना जाये कहीं ये दीया,

पेड़ो पर कुल्हाड़े चलाने से,

नोटों के बंडल खातिर

बावड़ियों के पेदें सुखाने से

क्यों चला रहे हो हथोड़े पहाड़ों पर,

क्यों सूनी ‘मां’ की छाती है,

क्यों गिरती हैं यहां खड़ी इमारतें,

क्यों पल में ‘सुनामी’ आ जाती है।

कुछ तो शर्म करो ऐ दुनिया वालों

बस जरा सी कसर बाकी है

अब इस दीये में और तेल नहीं

बस जरा सी बाती बाकी है।

क्यों खामोश हैं वो हवायें,

जो कभी खुशियों के राग सुनाती थी,

मिलाती थी ताल से ताल ‘बैसाखी’ पर

रंगों के संग इठलाती थी।

क्यों ठहर गयी वो गंगा,

जो कभी आयी फाड़कर ‘मां’ की छाती थी,

क्यों गौ मुख गया है सूख,

क्यों चिड़िया रेत में नहाती है।

कुछ तो शर्म करो ऐ दुनिया वालों

जल रहा है तेल, घट रही है बाती

बस जरा सी कसर बाकी है

टूट चुकी है धरती माता,

हम आदमजात के प्रहारों से,

छलनी हो गयी मां की छाती,

अब क्या ‘इतिहास’ दोहराना बाकी है।

कुछ तो शर्म करो ऐ दुनिया वालो,

बस जरा सी....कसर..बाकी है।

30.5.10

कृपया ध्यान दें, लापरवाही ठीक नहीं, दांत नही, तो कुछ नहीं

क्या आपने कभी अपने टूथब्रश के चुनाव के बारे में सोचा है! सामान्यतया लोग टूथब्रथ का चुनाव एवं खरीददारी उसके रंग, डिजाइन अथवा टीवी पर दिखाये जाने वाले विज्ञापनों के आधार पर करते हैं। टूथब्रश कार्य आपके प्रत्येक दांत तक पहुंचना तथा उन्हें पूरी दक्षता के साथ साफ करना होता है। एक सही टूथब्रश का उपयोग आपके मुंह की हाइजीन तथा पाइरिया की रोकथाम की तरफ बढ़ाया गया पहला कदम है। वहीं एक खराब ब्रश आपके दांतों की ठीक प्रकार से सफाई नहीं कर पाता एवं मात्र ओपचारिकता बनकर रह जाता है। यह कहना है डेन्टल सर्जन डॉ. कृष्ण कुमार का। डॉ. कृष्ण यहां आर्मी दि फेमिली डेन्टल केयर के उद्घाटन अवसर पर बोल रहे थे।


डॉ. कृष्ण ने आगे बताया कि एक नरम ब्रिसल्स ;टूथब्रश के बालद्ध वाला टूथब्रश उपयोग करना उचित होता है। सख्त ब्रिसल्स युक्त ब्रश आपके मसूड़ों को नुकसान पहुंचाता है। नरम ब्रिसल्स ज्यादा लचिले होते हैं जो दांत एवं मसूड़ों के बीच की जगह में भी पहुंचकर साफ करते हैं। टूथब्रश का सिर छोटा होना चाहिए, छोटा सिर आपके मुंह के प्रत्येक कोने में पहुंचकर सफाई करता है। टूथब्रश का हेन्डल ऐसा होना चाहिए जो ब्रश पकड़ते समय आरामदायक हो, तथा साथ ही आपको अपना ब्रश हर 3 महीने के अन्तराल में बदल लेना चाहिए। यह इस बात का ध्यान रखें कि अगर आपके ब्रश के ब्रिसल्स कुछ ही हतों में घिस जाते हैं तो आप बहुत उग्रता से ब्रश करते हो। बहुत तेज एवं उग्रता से ब्रश करने से आपके मसूड़ों को हानि पहुंच सकती है। इससे मसूड़े दांत की सतह से हट जाते हैं एवं दांतों की जड़े निकल आती हैं। दूसरी ओर अगर आपके ब्रशल्स 5 से 6 महिने के बाद भी खराब होने का संकेत नहीं देते तो आप अत्यधिक कोमलता से ब्रश करते हैं।

आजकल बाजार में कलरकोडेड ब्रश भी उपलब्ध हैं, इन ब्रश में ब्रिशल्स का बदलता रंग नया ब्रश लेने का संकेत देता है। एक ओर महत्वपूर्ण बात जिससे ज्यादातर लोग अनभिज्ञ होते हैं कि सर्दी, जुकाम, लू, गले की खंरास तथा अन्य मुंह के इन्फेक्सन के बाद ब्रश बदलना चाहिए, पहले वाले ब्रश का उपयोग इन इन्फेक्शन के पुनः एंव बार बार होने का कारण बन सकता है।

मुंह एवं दांतों के स्वास्थ्य से संबंधित आपके सवाल आप 9352167899 नम्बर पर एसएमएस कर सकते हैं।

29.5.10

छात्र एक, संस्थान दो

कल यानी 28 मई को, राजस्थान के एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र के पेज 2 और 3 पर दो अलग-अलग कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन थे। जिनमें से एक कोटा का प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान ऐलन था व दूसरा दिल्ली का प्रमुख कोचिंग संस्थान माना जाने वाला ‘आकाश। अब यहां देखने वाली बात यह थी कि दोनों के विज्ञापनों में ऐसी समानता थी कि जिसने भी गौर से देख लिया उसका सिर घूम गया। दोनों संस्थानों के विज्ञापनों में 3 छात्रों की फोटो समान रूप से लगी हुई थी, तो देखने वालों को अब समझ नहीं आ रहा था कि ये छात्र असलियत में हैं कौनसे संस्थान के ?

प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान झूठी लोकप्रियता हासिल करने के लिए कैसा-कैसा ‘कृत्य’ करते हैं, देखकर दुःख हुआ। अब ऐसे छात्र या अभिभावक जिन्होंने उक्त विज्ञापनों को गौर से नहीं देखा होगा, वे तो उन संस्थानों के रिजल्ट को बेहतर मान रहे होगें। लेकिन उन्हें क्या पता कि सरेआम उनकी आंखों में धूल झोंकी जा रही है।

शिक्षा भी अब पूरी तरह बाजारू हो चुकी है, शिक्षा के व्यापारी ग्राहक छात्र और उनके अभिभावकों को लूट लेने पर आमदा हैं। लेकिन इसमें किसी हद तक मीडिया भी जिम्मेदार हैं। विज्ञापनों की चकाचैंध ने उन्हें भी अंधा कर दिया है। पैसे की चमक की आड़ में लोग क्या छपवा रहे हैं, यह तो उन्हें भी दिखाई नहीं दे रहा है। अब इन विज्ञापनों के जरिये कितने छात्र और अभिभावक ठगे जाएगें...यह तो ठगने वाले जानें, पर इतना जरूर कहना चाहुंगा कि आप जो भी पढ़े, गौर से पढ़े और जहां भी पढ़ें, अच्छी तरह जांच पड़ताल कर पढ़े। क्योंकी ऊंची दुकानों पर अक्सर फीके पकवान ही मिला करते हैं।

27.5.10

सपने सच में सच होते हैं


सपने देखना ही काफी नहीं होता, बल्कि उन सपनों को पूरा करने के लिए कौशिश भी करनी होती है। फिर मुश्किलें खुद ही रास्ता बन जाती हैं और सफलता की एक कहानी रचती है, जिसमें दृढ़ इच्छा शक्ति वाला एक साधारण व्यक्ति नायक बनकर उभरता है।...ऐसे ही नायक बनकर उभरे हैं कोटपूतली के रविन्द्र यादव...जिन्होंने बहुत असामान्य परिस्थितियों में आईएएस बनने का फैसला किया...राह मंे मुश्किलें बहुत थी। पहले प्रयास में निराशा भी हाथ लगी...लेकिन रविन्द्र ने अगले ही प्रयास में वह हासिल कर लिया, जिसका सपना उनके स्वर्गीय पिताजी ने देखा था...आज हम आपको उन्हीं से रूबरू करवा रहें है...प्रस्तुत हैं आईएएस रविन्द्र यादव से बातचीत के मुख्य अंश।


प्रश्न- रविन्द्र जी, आपको आईएएस बनने का ख्याल कहां से आया यानी इसकी प्रेरणा कहां से मिली?

उत्तर- पिताजी की इच्छा थी कि मैं आईएएस बनूं, बस मैंने उनकी इसी इच्छा को पूरा करने के लिए हर तरह बाधा पार की।

प्रश्न- यह आपका कौनसा प्रयास था?

उत्तर- यह मेरा दूसरा प्रयास था। इससे पहले भी मैं साक्षात्कार तक पहुंचा था, लेकिन अपडेट नहीं होने के कारण निराश होना पड़ा था। इस बार मैंने कड़ी तैयारी के साथ खुद को पूरी तरह अपडेट रखा था।

प्रश्न- आईएएस तक पहुंचने के सफर को थोड़ा विस्तार से बतायें? ताकि जो लोग इस पद को पाने का सपना संजाये हुए हैं, उन्हें कुछ मदद मिल सके।

उत्तर- मुझ पर पारीवारिक जिम्मेदारियां थी। बहनों की शादी करनी थी, इसलिए अधिक संघर्ष करना पड़ा। मैं कहीं से भी कोई कोचिंग वैगरह नहीं ले पाया, हालांकि इसकी कमी भी मुझको महसूस हुई।...मैं बस यही कहना चाहुंगा कि इसमें व्यक्ति को प्रतिदिन अपडेट रहना जरूरी है। साक्षात्कार के दौरान घबराना नहीं चाहिए, किसी प्रश्न का जवाब नहीं आये तो ‘सॉरी’ कहा जा सकता है।

प्रश्न- साक्षात्कार के दौरान आपसे पहला सवाल क्या किया गया?

उत्तर- मुझसे सबसे पहले ई-गवर्नेंस के बारे में पूछा गया था। उसके बाद ग्लोबिंग वार्मिंग व भ्रष्टाचार से संबंधित प्रश्न थे। मैंने सभी प्रश्नों का धर्य पूवर्क जवाब दिया।

प्रश्न- आपने किस विषय से तैयारी की थी?

उत्तर- मैने लोकप्रशासन व भूगोल को अपने विषय के रूप में चुना था।

प्रश्न- आप कोटपूतली शहर से हैं, शहर की व्यवस्था व समस्याओं से वाकिफ हैं, अपने शहर की व्यवस्था या शहरवासियों से कुछ कहना चाहेगें?

उत्तर- मेरी इच्छा है कि कोटपूतली जिला बनें, जिला बनने पर यहां की समस्याऐं का स्वतः ही समाधान होता चला जाएगा। मैं चहता हूं कि गरीब का खास ध्यान रखा जाए...मैं क्षेत्र के लोगोंं से विशेष रूप से जुड़ा रहुंगा।

प्रश्न- आप अपनी सफलता का श्रेय किसे देते हैं?

उत्तर- मेरे इस मुकाम तक पहुंचने में मां आशालता का आशीर्वाद, बहनें रश्मि व ज्योति का समय-समय पर उत्साहवर्धन व पत्नी करूणा का भरपूर सहयोग रहा है। मैं अपनी सफलता इन्हीं को समर्पित करता हूं।

yaad...

यादें याद आती हैं,


तेरे साथ बीता हर लम्हा,

हर पल, हर मुलाकात,

हर बात याद आती है।


कितना भी बदलें अब

हम या तुम

वो सुनसान राहें, पथरीली डगर

रह रहकर याद आती हैं।


वो सूरज की पहली किरण के साथ

घंटो बतियाना तुम्हारे साथ,

हरियल घास की गुदगुदी

याद आती है।


यादें याद आती हैं,

तेरे साथ बीता हर लम्हा,

हर पल, हर मुलाकात,

हर बात याद आती है।

8.5.10

उफ् ये कैसा तंत्र है...?



इंदौर में राजस्थान पत्रिका पर हमले होना, वहां की सरकार और प्रशासन के नकारापन को दर्शाता है, जो अब तक अपराधियों पर नकेल नहीं कस सकी है। यह लोकतंत्र की हत्या का प्रयास है, उस संविधान की हत्या का प्रयास है, जो स्वतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है।...तो फिर अब तक वहां के सामाजिक संगठन, प्रशासन और सरकार किस बात का इंतजार कर रहे हैं, क्या अभी कुछ और होना बाकी है? होना तो यह चाहिए था कि ऐसे समाजकंटकों की नाक में तुरंत नकेल डाल उन्हें एहसास करा देना चाहिए था कि लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ से खिलवाड़ करने की हिमाकत करने पर क्या होता है, फिर राजस्थान पत्रिका तो निर्भिक और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए जानी जाती रही है।...मैं उन चंद राजनेताओं को साधूवाद देता हुं जिन्होंने संसद में सरकार के समक्ष प्रेस की स्वतंत्रता पर हो रहे हमले पर चिंता जाहिर की और जवाब मांगा।...लेकिन दुखः है कि भाजपा आलाकमान अभी तक इस मुद्दे पर चुप हैं।

7.5.10

गौ-शाला की जमीन पर टिकी भू-माफियाओं की नजर

कोटपूतली। शहर के बानसूर रोड़ स्थित गौ-शाला इन दिनों संकट के दौर से गुजर रही है। कारण कि कुछ समाजकंटक लोग यहां दान में आयी जमीन को खुर्द-बुर्द करने में लगे हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से यहां भू-माफिया सक्रिय हो रखे हैं और जमीन पर टेड़ी नजरें गड़ाए हुए हैं। अभी हाल ही यहां गौ-शाला के मुख्य द्वार के सामने की जमीन जो की गौ-शाला को दान में मिली हुई है पर गौ-शाला समिति की ओर से गर्मी में गायों के लिए टीन शेड़ लगवाकर छाया करने हेतु निर्माण कार्य शुरू करवाया गया था, जिस पर कुछ भू-माफियाओं ने अपना हक जताते हुए कार्य बंद करवा दिया?...जबकि समिति के लोगों का कहना है कि उक्त जमीन गौ-शाला की ही है। इस संबध में गौ-शाला समिति के सदस्य रामकंुवार ने बताया कि ‘यहां गायों के लिए टीन-शेड़ लगाकर छाया करने का इंतजाम किया जा रहा था, जिसे कुछ बाहुबली समाजकंटकों ने आकर काम रूकवा दिया। अब हम समिति के सभी लोग इक्ठ्ठा होकर यहां अपनी निगरानी में कार्य करवा रहे हैं। इसी तरह समिति के सरंक्षक हरीशचंद्र चर्तुवेदी व उपाध्यक्ष कैलाशचंद चैकड़ायत व अशोक सुरेलिया ने जानकारी दी।


समिति के संरक्षक ने बताया कि हम गौ-शाला की जमीन को ऐसे ही खुर्द-बुर्द नहीं होने देगें। हम पूरे जी-जान से यहां डटे हुए हैं। जरूरत पड़ी तो कोटपूतली जनता से गौ-शाला बचाओ का आह्नान करेंगे। लेकिन गौ-माता के लिए चारे, पानी व गर्मी में छाया का इंतजाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगे।

समिति के सदस्य व युवा रेवॉल्युशन के अध्यक्ष मनोज चैधरी एवं संयोजक मंयक शर्मा ने भी भू-माफियाओं से डटकर मुकाबला करने की बात कही।