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आपके एसएमएस, (न्यूज चक्र, एसएमएस जंक्शन से )

वक्त कम था बात अधूरी रह गई, अच्छे लोगों से मुलाकात अधूरी रह गई, उसे जाने के बाद हम रोये बहुत, कोन कहता है बरसात अधूरी रह गई।                              - रोकी सिंह, बनेठी किसी की चाहत को सजा मत देना, किसी की मोहब्ब्त का दगा मत देना, जिसे तुम्हारे बिना जीने की आदत ना हो, उसे कभी लम्बी उम्र की दुआ मत देना। - सुभाष कसाना, नांगल चेचिका एक दूजे के दिल में रहते हैं हम, इक दूजे का दर्द समझते हैं हम, दोस्ती ऐसे निभाते हैं हम कि दूर होकर भी साथ होने का अहसास दिलाते हैं। - मनोज शुक्ला, कोटपूतली सोचो कहां है हम- एक ऐसे देश में जहां ‘पिज्जा’ किसी के घर एक एम्बूलेंस और पुलिस से पहले पहुंच जाता है, कार खरीदने के लिए लिया गया लोन ऐजूकेशन लोने से सस्ता है। जहां चावल चालीस रूपए किलो है, जबकि सिमकार्ड फ्री में मिल जाता है और दुर्गा मां की पूजा की जाती है लेकिन कन्या भ्रुण जन्म से पहले ही नष्ट कर दिया जात है। - संजय आर्य, गोनेड़ा हंसी के लिए गम कुर्बान, खुशी के लिए आंसू कुर्बान, दोस्ती के लिए जान कुर्बान और दोस्त की जान के लिए हम कुर्बान। राज मान, जयसिंहपुरा लोग प्यार दिल से नहीं चेहरे

शौचालय को ही बना दिया आश्रय स्थल....

जरा सी चूक जीवन दशा बदल सकती है

लापरवाही का शिकार गांव बनेटी, सभी सुविधाऐं होने के बावजूद उनका उपयोग नहीं कर पा रहे ग्रामवासी

कैरियर नॉलेज व जिज्ञासा से भरपूर

ज्ञान सामान्य ज्ञान, नौकरी भर्ती की जानकारी...अभी पढ़े

खेल- fफलमी दुfनया

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पहले वीfडयोग्राफी fफर नोfटस...

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न्यूज चक्र का नया अंक (नवम्बर -2) पेज 8

न्यूज चक्र का नया अंक (नवम्बर -2) पेज 7

न्यूज चक्र का नया अंक (नवम्बर -2) पेज 6,,,,,फिल्मी-मनोरंजन

न्यूज चक्र का नया अंक (नवम्बर-2) पेज 5 ज्ञान -सामान्य ज्ञान

न्यूज चक्र का नया अंक (नवम्बर-2) पेज 4

न्यूज चक्र का नया अंक (नवम्बर-2) पेज 2

‘बुढ़ापे’ का शिकार, युवा बेरोजगार

युवा रोजगार के लिए दर-दर भटकने को मजबूर, सरकार दे रही है बुजुर्गों को नई नौकरी जब किसी आदमी की कोई मजबूरी होती है तो वो परिस्थितियों से समझौता करता है और किसी तरह अपना काम चलाने की वैकल्पिक व्यवस्था करता ही हैै। प्रदेश में हर साल लाखों छात्र पढ़ लिखकर, डिग्रियां लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालयों से रोजगार की तलाश में बाहर निकलते है और रोज एक नई दिशा लेकर उठते हैं कि आज उनको कहीं कोई नौकरी का अवसर मिल जाये। हमारे प्रदेश में भरपूर युवा शक्ति मौजूद होते हुए भी (वो भी बेरोजगार) हमारी सरकार की पता नहीं कौनसी मजबूरी है कि वो युवाओं को रोजगार देने की बजाय सेवानिवृत कर्मचारियों को ही और दो साल रखकर उनसे काम चलाना चाहती है। दो साल बाद क्या हो जाएगा? क्या दो साल बाद ये विभाग नहीं रहेगें या कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं रहेगी। फिर भी तो नई भर्ती करनी ही होगी ना? अगर आर्थिक दृष्टि से भी देखा जाये तो शायद यह फायदे का सौदा नहीं है क्योंकि एक तरफ तो शिक्षित बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देना पड़ता है और दूसरा उनकी बेरोजगारी की अवधि और दो साल बढ़ गयी, तो युवाओं में असंतोष फैलेगा और सेवानिवृत कर्मचारी

ओछी चादर का शिकार देश का भविष्य!

किसी भी समाज या देश का विकास उसकी शिक्षा पर निर्भर होता है। भारत सरकार ने भी इस क्षेत्र में एक सराहनीय कदम उठाते हुए 1 अप्रैल 2010 से 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा (आरटीआई)का प्रावधान किया है। कोई भी अधिनियम बनाना एक बात है और उसे असरदार व प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाना एक अलग बात है। आज अगर हम सरकारी स्कूलोंं के हालतों पर गौर करें तो पायेगें कि हमारी स्कूलों की दशा कितनी खराब है।...फोटो में दिए गये अखबारों की कतरनों से ही साफ जाहिर हो रहा है कि असल में हो क्या रहा है? प्रदेश में शिक्षकों की स्थिति पर एक नजर.... पदनाम               स्वीकृत           कार्यरत रिक्त व्याख्याता         19575      11230   8345 वरि.अध्यापक        37438       29934     7514 अध्यापक           12583         10478     2105 द्वित्तिय श्रेणी     31913     22824   9089 तृतीय श्रेणी        230153    177123  53030 प्रबोधक        28673         23141      5532 इसके अलावा नवक्रमोन्नत माध्यमिक व उच्च माध्यमिक विद्यालयों में अभी पदों क

हैल्थ टिप्स, नौकरी भर्ती, हंसी के ठिठोले...न्यूज चक्र के साथ

बढ़ाइये अपना सामान्य ज्ञान.....न्यूज चक्र के साथ

कहीं आपके घर में ‘बम ’तो नहीं?

जी हां, घरेलू गैस सिलेण्डर की भी एक्सपायरी डेट होती है और एक्सपायरी डेट निकलने के बाद गैस सिलेण्डर को इस्तेमाल करना बम की तरह खरतनाक हो सकता है। आमतौर पर गैस सिलेण्डर की रिफील लेते समय उपभोक्ताओं का ध्यान इसके वजन और सील पर ही होता है। उन्हें सिलेण्डर की एक्सपायरी डेट की जानकारी ही नहीं होती। इसी का फायदा एलपीजी की आपूर्ति करने वाली कंपनियां उठाती हैं और धड़ल्ले से एक्पायरी डेट वाले सिलेण्डर रिफील  कर हमारे घरों तक पहुंचाती हैं। यहीं कारण है कि गैस सिलेण्डरों से हादसे होते हैं। कैसे पता करें एक्सपायरी डेट क्षेत्र की मीणा गैस ऐजेन्सी के प्रबंधक अशोक मीणा एवं इण्डेन गैस के प्रबंधक मदन सिंह शेखावत ने बताया कि सिलेण्डर के ऊपरी भाग पर उसे पकड़ने के लिए गोल रिंग होती है और इसके नीचे तीन पट्टियों में से एक पर काले रंग से सिलेण्डर की एक्सपायरी डेट अंकित होती है। इसके तहत अंग्रेजी में ए, बी, सी तथा डी अक्षर अंकित होते है तथा साथ में दो अंक लिखे होते हैं। ए अक्षर साल की पहली तिमाही (जनवरी से मार्च), बी साल की दूसरी तिमाही (अप्रेल से जून), सी साल की तीसरी तिमाही (जुलाई से सितम्बर) तथा डी सा

अहसास करो तो...बोलती है कुर्सी

एक जमाना था जब मुझ पर बैठने वाले को लोग इज्जत और आदर के साथ देखते थे। आज जनता का भविष्य पूर्णतः मुझ पर बैठने वाले के हाथ में है। समाचार-पत्रों, टेलिविजन, पत्र-पत्रिकाओं में मेरा ही बोल-बाला रहता है। मेरे सामने किसी का राज नहीं बल्कि मुझ पर बैठने वाला ही राजा हो जाता है, पर इन सबके बावजूद कोई मुझसे कभी नहीं पूछता कि मुझे क्या ये सब पसंद है या नहीं? मित्रों! आज मुझे मौका मिला है इसलिए मैं आपको अपनी मनोदशा बता रही हूं। मुझ कुर्सी के लिए आजकल लोग क्या-क्या नहीं करते? मेरी वजह से कहीं दंगे होते हैं जो कहीं खून बहता है। भाई-भाई का नहीं रहता, बेटा बाप से मुकाबला कर बैठता है। मुझे पाने के लिए रुपया पानी की तरह बहा दिया जाता है। कहीं लोगों को विविध प्रकार के लालच देकर उनसे वोट लिया जाता है, कहीं ऊंचे-ऊंचे सपने दिखाए जाते हैं। साम, दाम, दण्ड, भेद सभी का उपयोग कर आखिर कोई न कोई मुझे पा लेता है। एक बार मुझ पर बैठने के बाद वह नेता जिसने चुनाव से पहले सिर्फ देने का वादा किया था, अब सिर्फ लेता ही लेता है। धीरे-धीरे शुरू हो जाता है भ्रष्टाचार का सिलसिला और जनता बेचारी हो जाती है बेहाल। यह सब देखकर
मैं पंछी उन्मुक्त गगन का जहां चाहा चला जाता हूं क्या रोकेगा, कौन रोकेगा हर दीवार लांघ जाता हू मेरी कोई एक राह नहीं जहां चाहा घूम आता हू मस्त प्रेमी भंवरे की तरह मैं डाल-डाल पर जाता हूं करता हूं रसपान कली का फूल-फूल मंडराता हूं अपनी ही मस्ती में मस्त झूम-झूमकर जब राग सुनाता हूं खिल उठती है कली कली रोम रोम में मैं बस जाता हूं ‘मन’ हू मैं अपने ही मन में ख्वाबों के फूल खिलाता हूं मैं पंछी उम्मुक्त गगन का.....।

प्रवेश प्रक्रिया शुरू, अंतिम तिथि 16 जून

राजस्थान विश्वविद्यालय में स्नात्तक एवं स्नातकोत्त कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में सत्र 2010-11 के लिए प्रवेश प्रक्रिया 1 जून से शुरू हो गई है। प्रवेश आवेदन पत्र प्रस्तुत करने की अंतिम तिथि 16 जून है। साथ ही 50 रूपये विलंब शुल्क के साथ 25 जून तक आवेदन पत्र जमा कराए जा सकगें। विश्वविद्यालय के संगठक महाविद्यालयों सहित 10 केन्द्रों पर आवेदन पत्र मिलेंगे। आवेदन पत्र का मूल्य 200 रूपए रखा गया है। प्रवेश आवेदन पत्र विश्वविद्यालय की वेबसाइट से भी डाउनलोड किया जा सकता है। डाउनलोड किए हुए आवेदन पत्र रजिस्ट्रार यूनिवर्सिटी आॅफ राजस्थान जयपुर के नाम से देय 200 रूपए के डिमांड ड्रॉफ्ट के साथ जमा कराए जा सकते हैं। विलम्ब शुल्क की स्थिति में डिमांड ड्रॉफ्ट 250 रूपए देय होगा।

महत्वाकांक्षाओं ने बचपन को भी रियल से रील बना दिया है, क्यों? (1 जून, बाल सुरक्षा दिवस पर विशेष)

बचपन! जीवन की सबसे सुनहरी अवस्था। एकदम अलमस्त...चिंता-फिकर, राग-द्वेष, हार-जीत से दूर। लेकिन आज?...बचपन के मायने बदल गए हैं। अब बचपन यानी...प्रतिस्पर्धा, प्रतियोगिता, स्टेज और स्टेज की धमक और चमक। आज अनजाने में मां बाप ही बच्चों का बचपन छीन रहे हैं, समाज में अपनी नाक ऊंची रखने की होड़ में बच्चे उनकी महत्वाकांक्षाओं के बीच मोहरा बनकर रह गये हैं। हर दिन, हर घंटे टीवी चैनलों पर प्रसारित होते रियलिटी शोज ने बच्चों का बचपन भी रियल से रील बना दिया है।...और इस रील के डायरेक्टर बन बैठे हैं उनके अपने मां-बाप, जो छोटे-छोटे बच्चों को लेकर घंटों आॅडिशन के लिए बैठे रहते हैं। कई बार तो कड़ी धूप में सुबह से शाम और फिर शाम से रात कर दी जाती है। कोई नहीं पूछता कि बच्चे ने कहाँ लघुशंका की, कहाँ खाया-पिया। जिन्हें देखभाल करनी चाहिए, वे खुद ही बच्चों को सताते हैं तो दूसरे कहां तक ख्याल रख सकते हैं। लेकिन इससे भी अहम बात यह है कि इन रियलिटी शोज तक पहुंचने के लिए, यानी उसकी तैयारी करने तक उन बच्चों पर कितना कहर बरपा होगा, जरा सोचिए? अभी एक शो में सैकड़ों बच्चे आडिशन से रह गए, तो उनके मां-बाप ने हंगामा मचा दि

याद रखोगे, तो प्रगति करोगे...

1. मस्तिष्क एक चमत्कारी अंग है। यह आपके जन्म के बाद से लगातार काम करता है, जब तक कि आप प्रेम में ना पड़ जांए। 2. दिमाग में भी उतनी ही ताकत होती है, जितनी हाथों में, दुनिया थामने के लिए ही नहीं बल्कि उसे बदलने के लिए भी।

बस जरा सी कसर बाकी है

कुछ तो शर्म करो ऐ दुनिया वालों, बस जरा सी कसर बाकी है, अब इस दीये में और तेल नहीं, बस जरा सी बाती बाकी है। बुझ ना जाये कहीं ये दीया, पेड़ो पर कुल्हाड़े चलाने से, नोटों के बंडल खातिर बावड़ियों के पेदें सुखाने से क्यों चला रहे हो हथोड़े पहाड़ों पर, क्यों सूनी ‘मां’ की छाती है, क्यों गिरती हैं यहां खड़ी इमारतें, क्यों पल में ‘सुनामी’ आ जाती है। कुछ तो शर्म करो ऐ दुनिया वालों बस जरा सी कसर बाकी है अब इस दीये में और तेल नहीं बस जरा सी बाती बाकी है। क्यों खामोश हैं वो हवायें, जो कभी खुशियों के राग सुनाती थी, मिलाती थी ताल से ताल ‘बैसाखी’ पर रंगों के संग इठलाती थी। क्यों ठहर गयी वो गंगा, जो कभी आयी फाड़कर ‘मां’ की छाती थी, क्यों गौ मुख गया है सूख, क्यों चिड़िया रेत में नहाती है। कुछ तो शर्म करो ऐ दुनिया वालों जल रहा है तेल, घट रही है बाती बस जरा सी कसर बाकी है टूट चुकी है धरती माता, हम आदमजात के प्रहारों से, छलनी हो गयी मां की छाती, अब क्या ‘इतिहास’ दोहराना बाकी है। कुछ तो शर्म करो ऐ दुनिया वालो, बस जरा सी....कसर..बाकी है।

कृपया ध्यान दें, लापरवाही ठीक नहीं, दांत नही, तो कुछ नहीं

क्या आपने कभी अपने टूथब्रश के चुनाव के बारे में सोचा है! सामान्यतया लोग टूथब्रथ का चुनाव एवं खरीददारी उसके रंग, डिजाइन अथवा टीवी पर दिखाये जाने वाले विज्ञापनों के आधार पर करते हैं। टूथब्रश कार्य आपके प्रत्येक दांत तक पहुंचना तथा उन्हें पूरी दक्षता के साथ साफ करना होता है। एक सही टूथब्रश का उपयोग आपके मुंह की हाइजीन तथा पाइरिया की रोकथाम की तरफ बढ़ाया गया पहला कदम है। वहीं एक खराब ब्रश आपके दांतों की ठीक प्रकार से सफाई नहीं कर पाता एवं मात्र ओपचारिकता बनकर रह जाता है। यह कहना है डेन्टल सर्जन डॉ. कृष्ण कुमार का। डॉ. कृष्ण यहां आर्मी दि फेमिली डेन्टल केयर के उद्घाटन अवसर पर बोल रहे थे। डॉ. कृष्ण ने आगे बताया कि एक नरम ब्रिसल्स ;टूथब्रश के बालद्ध वाला टूथब्रश उपयोग करना उचित होता है। सख्त ब्रिसल्स युक्त ब्रश आपके मसूड़ों को नुकसान पहुंचाता है। नरम ब्रिसल्स ज्यादा लचिले होते हैं जो दांत एवं मसूड़ों के बीच की जगह में भी पहुंचकर साफ करते हैं। टूथब्रश का सिर छोटा होना चाहिए, छोटा सिर आपके मुंह के प्रत्येक कोने में पहुंचकर सफाई करता है। टूथब्रश का हेन्डल ऐसा होना चाहिए जो ब्रश पकड़ते समय आरामदाय

छात्र एक, संस्थान दो

कल यानी 28 मई को, राजस्थान के एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र के पेज 2 और 3 पर दो अलग-अलग कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन थे। जिनमें से एक कोटा का प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान ऐलन था व दूसरा दिल्ली का प्रमुख कोचिंग संस्थान माना जाने वाला ‘आकाश। अब यहां देखने वाली बात यह थी कि दोनों के विज्ञापनों में ऐसी समानता थी कि जिसने भी गौर से देख लिया उसका सिर घूम गया। दोनों संस्थानों के विज्ञापनों में 3 छात्रों की फोटो समान रूप से लगी हुई थी, तो देखने वालों को अब समझ नहीं आ रहा था कि ये छात्र असलियत में हैं कौनसे संस्थान के ? प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान झूठी लोकप्रियता हासिल करने के लिए कैसा-कैसा ‘कृत्य’ करते हैं, देखकर दुःख हुआ। अब ऐसे छात्र या अभिभावक जिन्होंने उक्त विज्ञापनों को गौर से नहीं देखा होगा, वे तो उन संस्थानों के रिजल्ट को बेहतर मान रहे होगें। लेकिन उन्हें क्या पता कि सरेआम उनकी आंखों में धूल झोंकी जा रही है। शिक्षा भी अब पूरी तरह बाजारू हो चुकी है, शिक्षा के व्यापारी ग्राहक छात्र और उनके अभिभावकों को लूट लेने पर आमदा हैं। लेकिन इसमें किसी हद तक मीडिया भी जिम्मेदार हैं। विज्ञापनों की चक

सपने सच में सच होते हैं

सपने देखना ही काफी नहीं होता, बल्कि उन सपनों को पूरा करने के लिए कौशिश भी करनी होती है। फिर मुश्किलें खुद ही रास्ता बन जाती हैं और सफलता की एक कहानी रचती है, जिसमें दृढ़ इच्छा शक्ति वाला एक साधारण व्यक्ति नायक बनकर उभरता है।...ऐसे ही नायक बनकर उभरे हैं कोटपूतली के रविन्द्र यादव...जिन्होंने बहुत असामान्य परिस्थितियों में आईएएस बनने का फैसला किया...राह मंे मुश्किलें बहुत थी। पहले प्रयास में निराशा भी हाथ लगी...लेकिन रविन्द्र ने अगले ही प्रयास में वह हासिल कर लिया, जिसका सपना उनके स्वर्गीय पिताजी ने देखा था...आज हम आपको उन्हीं से रूबरू करवा रहें है...प्रस्तुत हैं आईएएस रविन्द्र यादव से बातचीत के मुख्य अंश। प्रश्न- रविन्द्र जी, आपको आईएएस बनने का ख्याल कहां से आया यानी इसकी प्रेरणा कहां से मिली? उत्तर- पिताजी की इच्छा थी कि मैं आईएएस बनूं, बस मैंने उनकी इसी इच्छा को पूरा करने के लिए हर तरह बाधा पार की। प्रश्न- यह आपका कौनसा प्रयास था? उत्तर- यह मेरा दूसरा प्रयास था। इससे पहले भी मैं साक्षात्कार तक पहुंचा था, लेकिन अपडेट नहीं होने के कारण निराश होना पड़ा था। इस बार मैंने कड़ी तैयार

yaad...

यादें याद आती हैं, तेरे साथ बीता हर लम्हा, हर पल, हर मुलाकात, हर बात याद आती है। कितना भी बदलें अब हम या तुम वो सुनसान राहें, पथरीली डगर रह रहकर याद आती हैं। वो सूरज की पहली किरण के साथ घंटो बतियाना तुम्हारे साथ, हरियल घास की गुदगुदी याद आती है। यादें याद आती हैं, तेरे साथ बीता हर लम्हा, हर पल, हर मुलाकात, हर बात याद आती है।
उफ् ये कैसा तंत्र है...? इंदौर में राजस्थान पत्रिका पर हमले होना, वहां की सरकार और प्रशासन के नकारापन को दर्शाता है, जो अब तक अपराधियों पर नकेल नहीं कस सकी है। यह लोकतंत्र की हत्या का प्रयास है, उस संविधान की हत्या का प्रयास है, जो स्वतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है।...तो फिर अब तक वहां के सामाजिक संगठन, प्रशासन और सरकार किस बात का इंतजार कर रहे हैं, क्या अभी कुछ और होना बाकी है? होना तो यह चाहिए था कि ऐसे समाजकंटकों की नाक में तुरंत नकेल डाल उन्हें एहसास करा देना चाहिए था कि लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ से खिलवाड़ करने की हिमाकत करने पर क्या होता है, फिर राजस्थान पत्रिका तो निर्भिक और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए जानी जाती रही है।...मैं उन चंद राजनेताओं को साधूवाद देता हुं जिन्होंने संसद में सरकार के समक्ष प्रेस की स्वतंत्रता पर हो रहे हमले पर चिंता जाहिर की और जवाब मांगा।...लेकिन दुखः है कि भाजपा आलाकमान अभी तक इस मुद्दे पर चुप हैं।

गौ-शाला की जमीन पर टिकी भू-माफियाओं की नजर

कोटपूतली। शहर के बानसूर रोड़ स्थित गौ-शाला इन दिनों संकट के दौर से गुजर रही है। कारण कि कुछ समाजकंटक लोग यहां दान में आयी जमीन को खुर्द-बुर्द करने में लगे हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से यहां भू-माफिया सक्रिय हो रखे हैं और जमीन पर टेड़ी नजरें गड़ाए हुए हैं। अभी हाल ही यहां गौ-शाला के मुख्य द्वार के सामने की जमीन जो की गौ-शाला को दान में मिली हुई है पर गौ-शाला समिति की ओर से गर्मी में गायों के लिए टीन शेड़ लगवाकर छाया करने हेतु निर्माण कार्य शुरू करवाया गया था, जिस पर कुछ भू-माफियाओं ने अपना हक जताते हुए कार्य बंद करवा दिया?...जबकि समिति के लोगों का कहना है कि उक्त जमीन गौ-शाला की ही है। इस संबध में गौ-शाला समिति के सदस्य रामकंुवार ने बताया कि ‘यहां गायों के लिए टीन-शेड़ लगाकर छाया करने का इंतजाम किया जा रहा था, जिसे कुछ बाहुबली समाजकंटकों ने आकर काम रूकवा दिया। अब हम समिति के सभी लोग इक्ठ्ठा होकर यहां अपनी निगरानी में कार्य करवा रहे हैं। इसी तरह समिति के सरंक्षक हरीशचंद्र चर्तुवेदी व उपाध्यक्ष कैलाशचंद चैकड़ायत व अशोक सुरेलिया ने जानकारी दी। समिति के संरक्षक ने बताया कि

मेरा लाड़ला...

यूं ही नहीं उलझता ट्रेफिक?

हाइवे पर पुलिया निर्माण कार्य के चलते सब्जी मंडी तिराहे से लेकर आरटीएम होटल तक यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। घड़ी-घड़ी जाम और आपस में उलझता ट्रैफिक, व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाता है। ऐसा नहीं है कि व्यवस्था को संभालने या टैªफिक को काबू में करने के लिए कोई मौजूद नहीं रहता है, अगर चैराहों पर थोड़ी देर खड़े रहकर देखें तो ‘हर चैराहे पर 40 से 45 जवान तैनात दिखेगें, लेकिन इनकी उपस्थिति यहां ‘नगण्य -सी’ रहती है।...यानी उपस्थित रहकर भी अनुपस्थित। कोटपूतली शहर हाइवे के दो-तरफ बसा हुआ है, इसलिए यहां लोकल टैªफिक अधिक रहता है और अधिकतर वाहन शहर के मुख्य चैराहे एवं दीवान रीजेन्सी के सामने सब्जी मंड़ी तिराहे से शहर में प्रवेश करते हैं। यहां व्यवस्था संभालने के लिए प्रशासन ने काफी संख्या में होम गार्ड एवं पुलिस के जवान मुस्तैद कर रखे हैं। लेकिन इनकी हालत ये है कि बिगड़ती व्यवस्था को ये मूकदर्शक बने देखते रहते हैं, यहां तक कि किसी के टोकने पर भी ये किसी को टोकना उचित नहीं समझते...और अगर किसी को टोक लेते हैं तो फिर गाड़ी को कोने में लगवाये बिना नहीं छोड़ते हैं। ऐसी व्यवस्था के कारण हालात ये रह

आज तुम फिर खफा हो

आज तुम फिर खफा हो मुझसे, जानता हूँ मैं, न मनाऊगा तुमको, इस बार मैं। तुम्हारा उदास चेहरा, जिस पर झूठी हसी लिये, चुप हो तुम, घूमकर दूर बैठी, सर को झुकाये, बातों को सुनती, पर अनसुना करती तुम, ये अदायें पहचानता हूँ मैं, आज तुम फिर खफा हो मुझसे, जानता हूँ मैं। नर्म आखों में जलन क्यों है? सुर्ख होठों पे शिकन क्यों है? चेहरे पे तपन क्यों है? कहती जो एक बार मुझसे, तुम कुछ भी, मानता मै, लेकिन बिन बताये क्यों? आज तुम फिर खफा हो मुझसे, जानता हूँ मै।।