28.12.10

आपके एसएमएस, (न्यूज चक्र, एसएमएस जंक्शन से )

वक्त कम था बात अधूरी रह गई, अच्छे लोगों से मुलाकात अधूरी रह गई, उसे जाने के बाद हम रोये बहुत, कोन कहता है बरसात अधूरी रह गई।                              - रोकी सिंह, बनेठी

किसी की चाहत को सजा मत देना, किसी की मोहब्ब्त का दगा मत देना, जिसे तुम्हारे बिना जीने की आदत ना हो, उसे कभी लम्बी उम्र की दुआ मत देना। - सुभाष कसाना, नांगल चेचिका

एक दूजे के दिल में रहते हैं हम, इक दूजे का दर्द समझते हैं हम, दोस्ती ऐसे निभाते हैं हम कि दूर होकर भी साथ होने का अहसास दिलाते हैं। - मनोज शुक्ला, कोटपूतली

सोचो कहां है हम-
एक ऐसे देश में जहां ‘पिज्जा’ किसी के घर एक एम्बूलेंस और पुलिस से पहले पहुंच जाता है, कार खरीदने के लिए लिया गया लोन ऐजूकेशन लोने से सस्ता है। जहां चावल चालीस रूपए किलो है, जबकि सिमकार्ड फ्री में मिल जाता है और दुर्गा मां की पूजा की जाती है लेकिन कन्या भ्रुण जन्म से पहले ही नष्ट कर दिया जात है।
- संजय आर्य, गोनेड़ा

हंसी के लिए गम कुर्बान, खुशी के लिए आंसू कुर्बान, दोस्ती के लिए जान कुर्बान और दोस्त की जान के लिए हम कुर्बान। राज मान, जयसिंहपुरा

लोग प्यार दिल से नहीं चेहरे से करते हैं, वो दिन पे नहीं सुंदरता पर मरते हैं, हम सुंदर नहीं पर दिल के साफ हैं इसलिए बहुत कम लोग हमें पसंद करते हैं। बजरंग वर्मा

हर खुशी दिल के करीब नहीं होती, जिंदगी गमों से दूर नहीं होती, ऐ दोस्त दोस्ती को संजोकर रखना, दोस्ती हर किसी को नसीब नहीं होती। - कैलाश, करवास

दिल ने जो चाहा आज तक कभी नहीं पाया, झूठी मुस्कान में हमने हमेशा गम को छुपाया, वैसे तो हर इंसान तकदीर को अजमाता है और एक हम हैं जिसे हर बार तकदीर ने आजमाया। - अज्ञात

दोस्ती उनसे करो जो निभाना जानते हैं, नफरत उनसे करो जो भूलाना जानते हैं, गुस्सा उन पर करो जो मनाना जानते हैं, यारी उनसे करो जो दिलो-जान लुटाना जानते हैं, जैसे कि हम। - प्रदीप, बनेठी

किस्मत पर ऐतबार किसको है, मिल जाए खुशी, इनकार किसको है कुछ मजबूरियां है मेरे दोस्त वरना जुदाई से प्यार किसको है। - परविन्दर कुमार।

कहीं सुबह तो कहीं शाम होगी, हमारी हर खुशी आपके नाम होगी, कुछ मांगकर तो देखिए हमसे, होठों पर हंसी और हथेली पर जान होगी। -राकेश रावत, गोपालपुरा।

बिना कहे सब कुछ कह जाते हैं, बिना कसूर सब कुछ सह जाते हैं, दूर रहकर भी जो अपना फर्ज निभाते हैं वही रिश्ते तो अपने कहलाते हैं। - राकेश वर्मा, बहरोड़

मुस्कुराती आंखों से अफसाना लिखा था, शायद आपकी जिंदगी में आना लिखा था, तकदीर तो देखो मेेरे आंसू की, इनका भी आपकी याद में बह जाना लिखा था।- रॉकी सिंह, बनेठी।

अहसान नहीं अहसास है दोस्ती, जिन्दगी के इम्तिहान में इक मुसकान है दोस्ती, जान देना बड़ी बात नही, उमर भी साथ निभाने का नाम है दोस्ती।  -अन्नु कंवर, बनेठी।

तन्हा जिन्दगी हम जीया नहीं करते, दूसरों से जाम छीनकर हम पीया नहीं करते, उनको मोहब्बत है तो आकर इजहार करें, हम भी किसी का पीछा किया नहीं करते।- कृष्ण चंदेला, ढ़ाणी कांकरिया

दोस्ती का रिश्ता दो अन्जानों को जोड़ देता है, हर कदम पर जिन्दगी को नया मोड़ देता ह, वो रिश्ता साथ देता है तब, जब अपना साया भी साथ छोड़ देता है। - मनीष, कोट

आप को चाहा भी तो, इजहार करना नहीं आया, कट गयी उमर सारी, हमं प्यार करना नहीं आया, आपने मांगी भी तो जुदाई मांगी हमसे, और हमें इनकार करना नहीं आया। - सतीश, स्लामपुर

रात को रात का तोहफा नहीं देते, दिल को जज्बात का तोहफा नहीं देते, देने को तो हम आपको चांद भी दे देते, लेकिन चांद को चांद का तोहफा नहीं देते। - मनीष जोगिड़, गूंती

प्यार बिकता नहीं इस जमाने में, ये तो हासिल होता है किसी को आजमाने में, जिन्दगी का हर गम दूर हो जाता है, बस किसी के इक बार मुस्कुराने में।- रामसिंह प्रजापत, बहरोड़

हर बात ऐसी करो, इतिहास बन जाए, हर कदम के गवाह चांद सितारे बन जाए
किस्मत के भरोसे जिन्दगी में ना डगमगाना, कर्म ऐसे करो कि किस्मत खुद बन जाए।- रेखा कंवर, बनेठी

कभी तो की होगी चांद ने सूरज से मोहब्बत, तभी तो इसमें दाग है, मुुमकिन है हुई होगी सूरज से बेवफाई तभी तो इसमें आग है। - ममता कुमारी, बनेठी

कांटों को चुभना सिखाया नहीं जाता, फूलों को खिलना सिखाया नहीं जाता, कोई बन जाता है खुद ही अपना, किसी को अपना बनाया नहीं जाता।- हवासिंह पोषवाल

क्यांे मरते हो किसी सनम के लिए, न देगी दुपट्टा कफन के लिए, मरना है तो मरो वतन के लिए, तिरंगा तो मिलेगा कफन के लिए।- रीना कुमारी, जयसिंहपुरा

हर जलते दीपक के तले अंधेरा होता है, हर अंधेरी रात के पीछे सवेरा होता है, घबरा जाते हैं कायर लोग मुसीबत को देखकर, हर मुसीबत के पीछे सुख का डेरा होता है।- निशा चैधरी, करवास

दूध मांगो तो चावल देगें पकि पकाई खीर नहीं देगें, ऐ पाकिस्तानियों सुन लो, कश्मीर तो क्या कश्मीर की तस्वीर भी नहीं देगें।- संदीप सिंह जाट, करवास

अमन बेच डाला, चमन बेच डाला, वतन की हिफाजत करेगें वो क्या, जिन्होंने शहीदों का कफन बेच डाला-  कृष्ण कुमार, करवास

रे बंदे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है, वहां ना हाथी है ना घोड़ा है, वहां पैदल ही जाना है।- हंसराज डागर, जयसिंहपुरा

24.12.10

शौचालय को ही बना दिया आश्रय स्थल....

जरा सी चूक जीवन दशा बदल सकती है

लापरवाही का शिकार गांव बनेटी, सभी सुविधाऐं होने के बावजूद उनका उपयोग नहीं कर पा रहे ग्रामवासी

कैरियर नॉलेज व जिज्ञासा से भरपूर

ज्ञान सामान्य ज्ञान, नौकरी भर्ती की जानकारी...अभी पढ़े

खेल- fफलमी दुfनया

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पहले वीfडयोग्राफी fफर नोfटस...

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24.11.10

न्यूज चक्र का नया अंक (नवम्बर -2) पेज 8

न्यूज चक्र का नया अंक (नवम्बर -2) पेज 7

न्यूज चक्र का नया अंक (नवम्बर -2) पेज 6,,,,,फिल्मी-मनोरंजन

न्यूज चक्र का नया अंक (नवम्बर-2) पेज 5 ज्ञान -सामान्य ज्ञान

न्यूज चक्र का नया अंक (नवम्बर-2) पेज 4

न्यूज चक्र का नया अंक (नवम्बर-2) पेज 2

8.11.10

‘बुढ़ापे’ का शिकार, युवा बेरोजगार

युवा रोजगार के लिए दर-दर भटकने को मजबूर, सरकार दे रही है बुजुर्गों को नई नौकरी


जब किसी आदमी की कोई मजबूरी होती है तो वो परिस्थितियों से समझौता करता है और किसी तरह अपना काम चलाने की वैकल्पिक व्यवस्था करता ही हैै।
प्रदेश में हर साल लाखों छात्र पढ़ लिखकर, डिग्रियां लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालयों से रोजगार की तलाश में बाहर निकलते है और रोज एक नई दिशा लेकर उठते हैं कि आज उनको कहीं कोई नौकरी का अवसर मिल जाये। हमारे प्रदेश में भरपूर युवा शक्ति मौजूद होते हुए भी (वो भी बेरोजगार) हमारी सरकार की पता नहीं कौनसी मजबूरी है कि वो युवाओं को रोजगार देने की बजाय सेवानिवृत कर्मचारियों को ही और दो साल रखकर उनसे काम चलाना चाहती है। दो साल बाद क्या हो जाएगा? क्या दो साल बाद ये विभाग नहीं रहेगें या कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं रहेगी। फिर भी तो नई भर्ती करनी ही होगी ना? अगर आर्थिक दृष्टि से भी देखा जाये तो शायद यह फायदे का सौदा नहीं है क्योंकि एक तरफ तो शिक्षित बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देना पड़ता है और दूसरा उनकी बेरोजगारी की अवधि और दो साल बढ़ गयी, तो युवाओं में असंतोष फैलेगा और सेवानिवृत कर्मचारी को नये के मुकाबले वेतन भी ज्यादा देना पड़गा। क्योंकि सरकार उनको पेंशन घटाकर वेतन देने की बात कर रही हैै तो अगर आज एक कर्मचारी 30,000 रूपये मासिक वेतन पाता है तो पेंशन घटाकर भी उसका वेतन 14.15 हजार रूपए तो हो ही जायेगा। अब अगर नई भर्ती से उसी पद पर कोई युवा आता है तो दो साल तो उसका परिविक्षा काल ही रहेगा और उस दौरान उसको निश्चित वेतन के तौर पर 8 से 10 हजार रूपये तक ही देने पड़गें।
इसके बावजूद भी अगर सरकार को कुछ आर्थिक फायदा होता भी है तो बेरोजगारी की समस्या को ध्यान में रखते हुए नई भर्ती से ही पद भरने चाहिए। क्योंकि इससे प्रदेश को दो तरह से फायदा होता है, एक तो बेरोजगारी दूर होगी, दूसरा प्रदेश को युवा कर्मचारी मिलेगें जिनमें कुछ कर दिखाने का, कुछ बनने का सपना होता है, उमंग होती है, उत्साह होता है। सेवानिवृत तो सेवानिवृत ही होते हैं वो तो बन चुके उनको जो बनना था, उन्होंने तो कर लिया जो उनको करना था। अगर सरकार युवाओं पर ध्यान दे तो ज्यादा लाभदायक रहेगा, युवाओं के लिए भी, समाज के लिए भी व देश के लिए भी।

7.11.10

ओछी चादर का शिकार देश का भविष्य!

किसी भी समाज या देश का विकास उसकी शिक्षा पर निर्भर होता है। भारत सरकार ने भी इस क्षेत्र में एक सराहनीय कदम उठाते हुए 1 अप्रैल 2010 से 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा (आरटीआई)का प्रावधान किया है।
कोई भी अधिनियम बनाना एक बात है और उसे असरदार व प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाना एक अलग बात है। आज अगर हम सरकारी स्कूलोंं के हालतों पर गौर करें तो पायेगें कि हमारी स्कूलों की दशा कितनी खराब है।...फोटो में दिए गये अखबारों की कतरनों से ही साफ जाहिर हो रहा है कि असल में हो क्या रहा है?
प्रदेश में शिक्षकों की स्थिति पर एक नजर....
पदनाम               स्वीकृत           कार्यरत रिक्त
व्याख्याता         19575      11230   8345
वरि.अध्यापक        37438       29934     7514
अध्यापक           12583         10478     2105
द्वित्तिय श्रेणी     31913     22824   9089
तृतीय श्रेणी        230153    177123  53030
प्रबोधक        28673         23141      5532
इसके अलावा नवक्रमोन्नत माध्यमिक व उच्च माध्यमिक विद्यालयों में अभी पदों की स्वीकृति ही नहीं मिल पायी है और हालात ये हैं कि स्कूल 10वीं तक हो गया लेकिन वहां अभी भी तृतीय श्रेणी शिक्षक ही अध्यापन कार्य करवा रहे हैं और उनकी भी कई स्कूलों में तो संख्या वही है जो उच्च प्राथमिक विद्यालय के समय थी। सच्चाई यह है कि बहुत से स्कूल जो 8वीं या 10वीं कक्षा के स्तर के हैं आज भी 3 या 5 अध्यापकों के भरोसे चल रहे हैं। विषयाध्यापकों के तो कोई ठिकाने ही नहीं हैं। आज भी 9वीं व 10वीं के छात्रों को विज्ञान, अंग्रेजी व गणित जैसे विषय वही तृतीय श्रेणी अध्यापक ही पढ़ा रहे हैं तो हम सोच सकते हैं कि हमारे छात्र-छात्राओं को कितनी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही होगी। इसे बच्चों के भविष्य के साथ सरासर खिलवाड़ नहीं तो और क्या कहें? पिछले 6-7 महीने से हमारे शिक्षामंत्री समानीकरण की कवायद में जुटे हुए थे, उससे (समानीकरण) कुछ फर्क पड़ा या नहीं यह अलग बात है लेकिन मेरे विचार में तो सरकार का समानीकरण का फामूला ही त्रृटिपूर्ण यानी खामीयुक्त था।
फार्मूले का आधार छात्र संख्या रखी गयी थी ना कि कक्षाओं की संख्या। उदाहरण के तौर पर 1 से 8वीं तक की स्कूल में अगर 150 तक छात्रों की संख्या है तो पांच अध्यापक होंगे तथा 151 से 200 हैं तो 6 अध्यापक होगेंं। इसमें सोचने वाली बात यह है कि 150 छात्रों में भी कक्षाऐं तो आठ ही होंगी।...तो एक कक्षा के लिए एक शिक्षक तो चाहिए ही, अब उसमें छात्र संख्या 20 हो या 12, इससे क्या फर्क पड़ता हैै? सरकार आठवीं तक के स्कूल में 5 अध्यापक लगा रही है, हर किसी के समझ में आता है कि एक समय में एक अध्यापक एक ही कक्षा को पढ़ा सकेगा, तो बाकी तीन कक्षाओं का क्या होगा?...पता नहीं क्यों ये सीधा सा गणित हमारे नीति निर्धारकों के दिमाग में नहीं आया? इसमें भी कोढ़ मंे खाज का काम तब होता है जब अशैक्षिणिक कार्यों के लिए अध्यापकों की ड्यूटी लगा दी जाती है। कभी जनगणना तो कभी चाइल्ड ट्रेकिंग सर्वे, तो कभी मतदान, कभी पल्स पोलियो।..हर काम में अध्यापक ही नजर आते हैंं।
जब तक सरकारी स्कूलों में पर्याप्त अध्यापक उपलब्ध नहीं होगें, शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर सुधारा जाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की खराब गुणवत्ता के कारण ही औसत आय वाले माता पिता अपने बच्चों को उन सस्ते निजी स्कूलों में भर्ती कराने को मजबूर हैं जो सरकारी स्कूलों से बेहतर नहीं होते हुए भी सिर्फ एक बिन्दु के लिए बेहतर हैं वह यह कि उनके वहां कम से कम हर कक्षा के लिए एक अध्यापक तो है चाहे वह मात्र 10वीं या 12वीं पास ही क्यों ना हो। नये कानून के प्रभावी होने से इन सस्ते निजी स्कूूलों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा, क्योंििक अधिनियम के मापदण्डों को पूरा करने के लिए न तो उनके पास अच्छा स्कूल भवन है और ना ही खेल का मैदान है और ना ही वे प्रशिक्षित शिक्षक रखते हैं और ना ही प्रशिक्षित शिक्षकों को निर्धारित वेतन दे पाते हैं। हर शहर, कस्बे, यहां तक की गांवों में आज सस्ते निजी स्कूल गली गली में चल पड़े हैं वो भी रिहायशी मकानों में। ...और यह सब इसलिए चल रहे हैं, क्योंकि हमारी सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता उनसे भी खराब है, वहां बच्चों की कक्षा में अध्यापक दिखाई ही नहीं देते। और सरकार ने नई भर्ती करके अध्यापकों की पूर्ती करने की बजाय संख्या बल पर समानीकरण करके पूरे प्रदेश की बहुत सी स्कूलां में अध्यापक सरप्लस दिखा दिए जबकि वहां तो पहले से ही कमी हैै। अब अगर अधिनियम के दवाब से निजी स्कूल भी बंद हुए तो क्या स्थिति होगी, सोचने का विषय है।
गांव के स्कूलों पर आधारित स्कूली शिक्षा की रिर्पोट ‘असर 2009’ के मुताबिक देश के ग्रामीण स्कूलों में अभी भी 50 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो अपेक्षित स्तर से तीन कक्षा नीचे के स्तर पर हैं। यानी कक्षा आठ में पढ़ने वाले आधे बच्चों की लिखने पढ़ने की क्षमता कक्षा पांच के बराबर है और इसका मूल कारण है शिक्षकों की कमी।
यदि इस अधिनियम को वास्तव में प्रभावी बनाना है तो सरकार को सबसे पहले शिक्षकों की पूर्ती करनी होगी और उसके बाद अच्छी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए दूसरे मजबूत कदम उठाने पड़ेगें अन्यथा यह अधिनियम भी बेअसर हो जाएगा और बच्चों के भविष्य के साथ यह बहुत बड़ा खिलवाड़ होगा।
...मैं चाहूंगा कि अभिभावक वर्ग भी इसके बारे में सोचे और अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों को स्कूलों में आवश्यक सुविधाऐं व शिक्षक उपलब्ध कराने हेतु आवश्यक कदम उठाने को प्रेरित करें साथ ही आप अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति कितने जागरूक हैं और सरकारी विद्यालयों में और क्या अच्छा होना चाहिए, अपने सुझाव एवं विचारों से मुझे अवश्य अवगत करायें।

28.7.10

कहीं आपके घर में ‘बम ’तो नहीं?



जी हां, घरेलू गैस सिलेण्डर की भी एक्सपायरी डेट होती है और एक्सपायरी डेट निकलने के बाद गैस सिलेण्डर को इस्तेमाल करना बम की तरह खरतनाक हो सकता है। आमतौर पर गैस सिलेण्डर की रिफील लेते समय उपभोक्ताओं का ध्यान इसके वजन और सील पर ही होता है। उन्हें सिलेण्डर की एक्सपायरी डेट की जानकारी ही नहीं होती। इसी का फायदा एलपीजी की आपूर्ति करने वाली कंपनियां उठाती हैं और धड़ल्ले से एक्पायरी डेट वाले सिलेण्डर रिफील  कर हमारे घरों तक पहुंचाती हैं। यहीं कारण है कि गैस सिलेण्डरों से हादसे होते हैं।
कैसे पता करें एक्सपायरी डेट
क्षेत्र की मीणा गैस ऐजेन्सी के प्रबंधक अशोक मीणा एवं इण्डेन गैस के प्रबंधक मदन सिंह शेखावत ने बताया कि सिलेण्डर के ऊपरी भाग पर उसे पकड़ने के लिए गोल रिंग होती है और इसके नीचे तीन पट्टियों में से एक पर काले रंग से सिलेण्डर की एक्सपायरी डेट अंकित होती है। इसके तहत अंग्रेजी में ए, बी, सी तथा डी अक्षर अंकित होते है तथा साथ में दो अंक लिखे होते हैं। ए अक्षर साल की पहली तिमाही (जनवरी से मार्च), बी साल की दूसरी तिमाही (अप्रेल से जून), सी साल की तीसरी तिमाही (जुलाई से सितम्बर) तथा डी साल की चैथी तिमाही अर्थात अक्टूबर से दिसम्बर को दर्शाते हैं। इसके बाद लिखे हुए दो अंक एक्सपायरी वर्ष को संकेत करते हैं। यानि यदि सिलेण्डर पर डी 09 लिखा हुआ हो तो सिलेण्डर की एक्सपायरी दिसंबर 2009 है। इस सिलेण्डर का दिसम्बर 2009 के बाद उपयोग करना खतरनाक होता है। इस प्रकार के सिलेण्डर बम की तरह कभी भी फट सकते हैं। ऐसी स्थिति में उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे इस प्रकार के एक्सपायर सिलेण्डरों को लेने से मना कर दें तथा आपूर्तिकर्ता एजेंसी को इस बारे में सूचित करें।सिलेण्डर पर डी 09 लिखा हुआ हो तो सिलेण्डर की एक्सपायरी दिसंबर 2009 है। इस सिलेण्डर का दिसम्बर 2009 के बाद उपयोग करना खतरनाक होता है। इस प्रकार के सिलेण्डर बम की तरह कभी भी फट सकते हैं। ऐसी स्थिति में उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे इस प्रकार के एक्सपायर सिलेण्डरों को लेने से मना कर दें तथा आपूर्तिकर्ता एजेंसी को इस बारे में सूचित करें।
कहां लिखी होती है एक्सपायरी डेट...
फोटो में ध्यान से देखिए, सिलेण्डर में ए 20 अंकित किया हुआ है अर्थात सिलेण्‍डर मार्च 2020 में एक्सपायर होने वाला है।

15.6.10

अहसास करो तो...बोलती है कुर्सी


एक जमाना था जब मुझ पर बैठने वाले को लोग इज्जत और आदर के साथ देखते थे। आज जनता का भविष्य पूर्णतः मुझ पर बैठने वाले के हाथ में है। समाचार-पत्रों, टेलिविजन, पत्र-पत्रिकाओं में मेरा ही बोल-बाला रहता है। मेरे सामने किसी का राज नहीं बल्कि मुझ पर बैठने वाला ही राजा हो जाता है, पर इन सबके बावजूद कोई मुझसे कभी नहीं पूछता कि मुझे क्या ये सब पसंद है या नहीं?
मित्रों! आज मुझे मौका मिला है इसलिए मैं आपको अपनी मनोदशा बता रही हूं। मुझ कुर्सी के लिए आजकल लोग क्या-क्या नहीं करते? मेरी वजह से कहीं दंगे होते हैं जो कहीं खून बहता है। भाई-भाई का नहीं रहता, बेटा बाप से मुकाबला कर बैठता है। मुझे पाने के लिए रुपया पानी की तरह बहा दिया जाता है। कहीं लोगों को विविध प्रकार के लालच देकर उनसे वोट लिया जाता है, कहीं ऊंचे-ऊंचे सपने दिखाए जाते हैं। साम, दाम, दण्ड, भेद सभी का उपयोग कर आखिर कोई न कोई मुझे पा लेता है।
एक बार मुझ पर बैठने के बाद वह नेता जिसने चुनाव से पहले सिर्फ देने का वादा किया था, अब सिर्फ लेता ही लेता है। धीरे-धीरे शुरू हो जाता है भ्रष्टाचार का सिलसिला और जनता बेचारी हो जाती है बेहाल। यह सब देखकर क्रोध तो बहुत आता है पर मैं बस एक मूक दर्शक बन कर रह जाती हूं। कई बार तो परमेश्वर से प्रार्थना करती हूं कि काश! मेरे भी हाथ-पैर होते तो इन पापियों और देशद्रोहियों को अच्छा मजा चखाती।
बापू के इस देश में जहां पवित्रगंगा बहती है वहां राजनीति का गंदा नाला उफान भर रहा है। मेरा दुरूपयोग कर इस धरती मां को कष्ट दिया जा रहा है। कभी-कभी विचार आता है- कितना अच्छा होता अगर मेरा अस्तित्व ही न होता।
मित्रों! मेरी आपसे अपील है कि आप मेरे लिए नहीं अपने देश के लिए अपना वोट किसी समझदार और ईमानदार व्यक्ति को ही धर्म और मजहब से ऊपर उठकर मानवता के लिए दें।
मेरा अन्तिम सपना तो यही है कि एक दिन आएगा जब मुझ पर बैठने वाला अपने कत्र्तव्य का पालन करेगा और देश को आगे बढ़ाएगा। एक बार फिर से ये देश ‘‘सोने की चिड़िया’’ कहलाएगा।

9.6.10


मैं पंछी उन्मुक्त गगन का


जहां चाहा चला जाता हूं

क्या रोकेगा, कौन रोकेगा

हर दीवार लांघ जाता हू

मेरी कोई एक राह नहीं

जहां चाहा घूम आता हू

मस्त प्रेमी भंवरे की तरह

मैं डाल-डाल पर जाता हूं

करता हूं रसपान कली का

फूल-फूल मंडराता हूं

अपनी ही मस्ती में मस्त

झूम-झूमकर जब राग सुनाता हूं

खिल उठती है कली कली

रोम रोम में मैं बस जाता हूं

‘मन’ हू मैं अपने ही मन में

ख्वाबों के फूल खिलाता हूं

मैं पंछी उम्मुक्त गगन का.....।

1.6.10

प्रवेश प्रक्रिया शुरू, अंतिम तिथि 16 जून

राजस्थान विश्वविद्यालय में स्नात्तक एवं स्नातकोत्त कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में सत्र 2010-11 के लिए प्रवेश प्रक्रिया 1 जून से शुरू हो गई है। प्रवेश आवेदन पत्र प्रस्तुत करने की अंतिम तिथि 16 जून है। साथ ही 50 रूपये विलंब शुल्क के साथ 25 जून तक आवेदन पत्र जमा कराए जा सकगें।

विश्वविद्यालय के संगठक महाविद्यालयों सहित 10 केन्द्रों पर आवेदन पत्र मिलेंगे। आवेदन पत्र का मूल्य 200 रूपए रखा गया है। प्रवेश आवेदन पत्र विश्वविद्यालय की वेबसाइट से भी डाउनलोड किया जा सकता है। डाउनलोड किए हुए आवेदन पत्र रजिस्ट्रार यूनिवर्सिटी आॅफ राजस्थान जयपुर के नाम से देय 200 रूपए के डिमांड ड्रॉफ्ट के साथ जमा कराए जा सकते हैं। विलम्ब शुल्क की स्थिति में डिमांड ड्रॉफ्ट 250 रूपए देय होगा।

महत्वाकांक्षाओं ने बचपन को भी रियल से रील बना दिया है, क्यों? (1 जून, बाल सुरक्षा दिवस पर विशेष)

बचपन! जीवन की सबसे सुनहरी अवस्था। एकदम अलमस्त...चिंता-फिकर, राग-द्वेष, हार-जीत से दूर। लेकिन आज?...बचपन के मायने बदल गए हैं। अब बचपन यानी...प्रतिस्पर्धा, प्रतियोगिता, स्टेज और स्टेज की धमक और चमक।
आज अनजाने में मां बाप ही बच्चों का बचपन छीन रहे हैं, समाज में अपनी नाक ऊंची रखने की होड़ में बच्चे उनकी महत्वाकांक्षाओं के बीच मोहरा बनकर रह गये हैं। हर दिन, हर घंटे टीवी चैनलों पर प्रसारित होते रियलिटी शोज ने बच्चों का बचपन भी रियल से रील बना दिया है।...और इस रील के डायरेक्टर बन बैठे हैं उनके अपने मां-बाप, जो छोटे-छोटे बच्चों को लेकर घंटों आॅडिशन के लिए बैठे रहते हैं। कई बार तो कड़ी धूप में सुबह से शाम और फिर शाम से रात कर दी जाती है। कोई नहीं पूछता कि बच्चे ने कहाँ लघुशंका की, कहाँ खाया-पिया। जिन्हें देखभाल करनी चाहिए, वे खुद ही बच्चों को सताते हैं तो दूसरे कहां तक ख्याल रख सकते हैं। लेकिन इससे भी अहम बात यह है कि इन रियलिटी शोज तक पहुंचने के लिए, यानी उसकी तैयारी करने तक उन बच्चों पर कितना कहर बरपा होगा, जरा सोचिए?
अभी एक शो में सैकड़ों बच्चे आडिशन से रह गए, तो उनके मां-बाप ने हंगामा मचा दिया। नतीजतन शो के आयोजकों को देर रात तक आॅडिशन लेने पड़े। बच्चों ने देर रात तक आॅडिशन दिए। आॅडिशन में चयन ना होने पर एक बालमन पर क्या गुजरती है, यह भी ये रियलिटी शोज दिखाते हैं, वे दिखाते हैं कि कैसे अनसलेक्टेड बच्चा स्टेज पर फूट-फूटकर रो रहा है। इससे वो क्या दिखाना चाहते हैं?...और इससे मां-बाप क्या सबक लेते हैं? यह एक सोचने का विषय है।
आडिशन में नाकाम होने वाले बच्चे ऐसे रोते हैं जैसे जिंदगी ही खत्म हो गई है और आॅडिशन में चुन लिए गए बच्चे इस तरह चिल्लाकर खुशी जाहिर करते हैं, मानो जिंदगी का लक्ष्य मिल गया हो। नाकाम बच्चों के आँसू दिखाए जाते हैं, जिन्हें देखकर नाकाम रहने वाले बच्चे और गहरी उदासी में चले जाते हैं और कुंठाग्रस्त हो जाते हैं।...और कुंठाग्रस्त बच्चा बड़ा होकर भला अपना या समाज का क्या भला कर सकता है, वो तो बचपन में ही मानसिक रूप से समाज के खिलाफ कर दिया जाता है।
छोटी उम्र के बच्चों को मॉडलिंग और टीवी सीरियल में सताए जाने के खिलाफ एक अभियान चला भी था। मगर यह सिर्फ मंत्रालयों के पत्रों और बयानों तक सिमटकर रह गया।...मगर अब आवश्यक्ता है दर्शक वर्ग को जागने की, अब दर्शकों को ही कुछ सोचना होगा, नहीं तो रियलिटी शोज कब रियल जिन्दगी में आ धमकेगें, पता भी नहीं चलेगा। दर्शकों को चाहिए कि ऐसे शोज को बढ़ावा ना दें जिनमें अप्रत्यक्षरूप से ही सही, बच्चों पर अत्याचार होता हो।
ध्यान रहे, ऐसे शोज महज टीआरपी पर टिके होते हैं, जो दर्शकों के देखे जाने की गणना करती है, यानी आप ऐसे धारावाहिक या शो नहीं देखेगें तो वो ज्यादा दिन नहीं चल पायेगें।
मेरी राय में तो ऐसे शोज की तैयारी भी बालश्रम के अन्तर्गत ही आनी चाहिए क्योंकि यह सब भी नाम और पैसे के लिए ही होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि गरीब का बच्चा सीधा-सीधा श्रम करता दिखाई देता है जबकि पढ़े-लिखे और अमीर का बच्चा अपरोक्ष रूप से बालश्रम को भोगता है।

31.5.10

याद रखोगे, तो प्रगति करोगे...

1. मस्तिष्क एक चमत्कारी अंग है। यह आपके जन्म के बाद से लगातार काम करता है, जब तक कि आप प्रेम में ना पड़ जांए।


2. दिमाग में भी उतनी ही ताकत होती है, जितनी हाथों में, दुनिया थामने के लिए ही नहीं बल्कि उसे बदलने के लिए भी।

बस जरा सी कसर बाकी है

कुछ तो शर्म करो ऐ दुनिया वालों,


बस जरा सी कसर बाकी है,

अब इस दीये में और तेल नहीं,

बस जरा सी बाती बाकी है।

बुझ ना जाये कहीं ये दीया,

पेड़ो पर कुल्हाड़े चलाने से,

नोटों के बंडल खातिर

बावड़ियों के पेदें सुखाने से

क्यों चला रहे हो हथोड़े पहाड़ों पर,

क्यों सूनी ‘मां’ की छाती है,

क्यों गिरती हैं यहां खड़ी इमारतें,

क्यों पल में ‘सुनामी’ आ जाती है।

कुछ तो शर्म करो ऐ दुनिया वालों

बस जरा सी कसर बाकी है

अब इस दीये में और तेल नहीं

बस जरा सी बाती बाकी है।

क्यों खामोश हैं वो हवायें,

जो कभी खुशियों के राग सुनाती थी,

मिलाती थी ताल से ताल ‘बैसाखी’ पर

रंगों के संग इठलाती थी।

क्यों ठहर गयी वो गंगा,

जो कभी आयी फाड़कर ‘मां’ की छाती थी,

क्यों गौ मुख गया है सूख,

क्यों चिड़िया रेत में नहाती है।

कुछ तो शर्म करो ऐ दुनिया वालों

जल रहा है तेल, घट रही है बाती

बस जरा सी कसर बाकी है

टूट चुकी है धरती माता,

हम आदमजात के प्रहारों से,

छलनी हो गयी मां की छाती,

अब क्या ‘इतिहास’ दोहराना बाकी है।

कुछ तो शर्म करो ऐ दुनिया वालो,

बस जरा सी....कसर..बाकी है।

30.5.10

कृपया ध्यान दें, लापरवाही ठीक नहीं, दांत नही, तो कुछ नहीं

क्या आपने कभी अपने टूथब्रश के चुनाव के बारे में सोचा है! सामान्यतया लोग टूथब्रथ का चुनाव एवं खरीददारी उसके रंग, डिजाइन अथवा टीवी पर दिखाये जाने वाले विज्ञापनों के आधार पर करते हैं। टूथब्रश कार्य आपके प्रत्येक दांत तक पहुंचना तथा उन्हें पूरी दक्षता के साथ साफ करना होता है। एक सही टूथब्रश का उपयोग आपके मुंह की हाइजीन तथा पाइरिया की रोकथाम की तरफ बढ़ाया गया पहला कदम है। वहीं एक खराब ब्रश आपके दांतों की ठीक प्रकार से सफाई नहीं कर पाता एवं मात्र ओपचारिकता बनकर रह जाता है। यह कहना है डेन्टल सर्जन डॉ. कृष्ण कुमार का। डॉ. कृष्ण यहां आर्मी दि फेमिली डेन्टल केयर के उद्घाटन अवसर पर बोल रहे थे।


डॉ. कृष्ण ने आगे बताया कि एक नरम ब्रिसल्स ;टूथब्रश के बालद्ध वाला टूथब्रश उपयोग करना उचित होता है। सख्त ब्रिसल्स युक्त ब्रश आपके मसूड़ों को नुकसान पहुंचाता है। नरम ब्रिसल्स ज्यादा लचिले होते हैं जो दांत एवं मसूड़ों के बीच की जगह में भी पहुंचकर साफ करते हैं। टूथब्रश का सिर छोटा होना चाहिए, छोटा सिर आपके मुंह के प्रत्येक कोने में पहुंचकर सफाई करता है। टूथब्रश का हेन्डल ऐसा होना चाहिए जो ब्रश पकड़ते समय आरामदायक हो, तथा साथ ही आपको अपना ब्रश हर 3 महीने के अन्तराल में बदल लेना चाहिए। यह इस बात का ध्यान रखें कि अगर आपके ब्रश के ब्रिसल्स कुछ ही हतों में घिस जाते हैं तो आप बहुत उग्रता से ब्रश करते हो। बहुत तेज एवं उग्रता से ब्रश करने से आपके मसूड़ों को हानि पहुंच सकती है। इससे मसूड़े दांत की सतह से हट जाते हैं एवं दांतों की जड़े निकल आती हैं। दूसरी ओर अगर आपके ब्रशल्स 5 से 6 महिने के बाद भी खराब होने का संकेत नहीं देते तो आप अत्यधिक कोमलता से ब्रश करते हैं।

आजकल बाजार में कलरकोडेड ब्रश भी उपलब्ध हैं, इन ब्रश में ब्रिशल्स का बदलता रंग नया ब्रश लेने का संकेत देता है। एक ओर महत्वपूर्ण बात जिससे ज्यादातर लोग अनभिज्ञ होते हैं कि सर्दी, जुकाम, लू, गले की खंरास तथा अन्य मुंह के इन्फेक्सन के बाद ब्रश बदलना चाहिए, पहले वाले ब्रश का उपयोग इन इन्फेक्शन के पुनः एंव बार बार होने का कारण बन सकता है।

मुंह एवं दांतों के स्वास्थ्य से संबंधित आपके सवाल आप 9352167899 नम्बर पर एसएमएस कर सकते हैं।

29.5.10

छात्र एक, संस्थान दो

कल यानी 28 मई को, राजस्थान के एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र के पेज 2 और 3 पर दो अलग-अलग कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन थे। जिनमें से एक कोटा का प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान ऐलन था व दूसरा दिल्ली का प्रमुख कोचिंग संस्थान माना जाने वाला ‘आकाश। अब यहां देखने वाली बात यह थी कि दोनों के विज्ञापनों में ऐसी समानता थी कि जिसने भी गौर से देख लिया उसका सिर घूम गया। दोनों संस्थानों के विज्ञापनों में 3 छात्रों की फोटो समान रूप से लगी हुई थी, तो देखने वालों को अब समझ नहीं आ रहा था कि ये छात्र असलियत में हैं कौनसे संस्थान के ?

प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान झूठी लोकप्रियता हासिल करने के लिए कैसा-कैसा ‘कृत्य’ करते हैं, देखकर दुःख हुआ। अब ऐसे छात्र या अभिभावक जिन्होंने उक्त विज्ञापनों को गौर से नहीं देखा होगा, वे तो उन संस्थानों के रिजल्ट को बेहतर मान रहे होगें। लेकिन उन्हें क्या पता कि सरेआम उनकी आंखों में धूल झोंकी जा रही है।

शिक्षा भी अब पूरी तरह बाजारू हो चुकी है, शिक्षा के व्यापारी ग्राहक छात्र और उनके अभिभावकों को लूट लेने पर आमदा हैं। लेकिन इसमें किसी हद तक मीडिया भी जिम्मेदार हैं। विज्ञापनों की चकाचैंध ने उन्हें भी अंधा कर दिया है। पैसे की चमक की आड़ में लोग क्या छपवा रहे हैं, यह तो उन्हें भी दिखाई नहीं दे रहा है। अब इन विज्ञापनों के जरिये कितने छात्र और अभिभावक ठगे जाएगें...यह तो ठगने वाले जानें, पर इतना जरूर कहना चाहुंगा कि आप जो भी पढ़े, गौर से पढ़े और जहां भी पढ़ें, अच्छी तरह जांच पड़ताल कर पढ़े। क्योंकी ऊंची दुकानों पर अक्सर फीके पकवान ही मिला करते हैं।

27.5.10

सपने सच में सच होते हैं


सपने देखना ही काफी नहीं होता, बल्कि उन सपनों को पूरा करने के लिए कौशिश भी करनी होती है। फिर मुश्किलें खुद ही रास्ता बन जाती हैं और सफलता की एक कहानी रचती है, जिसमें दृढ़ इच्छा शक्ति वाला एक साधारण व्यक्ति नायक बनकर उभरता है।...ऐसे ही नायक बनकर उभरे हैं कोटपूतली के रविन्द्र यादव...जिन्होंने बहुत असामान्य परिस्थितियों में आईएएस बनने का फैसला किया...राह मंे मुश्किलें बहुत थी। पहले प्रयास में निराशा भी हाथ लगी...लेकिन रविन्द्र ने अगले ही प्रयास में वह हासिल कर लिया, जिसका सपना उनके स्वर्गीय पिताजी ने देखा था...आज हम आपको उन्हीं से रूबरू करवा रहें है...प्रस्तुत हैं आईएएस रविन्द्र यादव से बातचीत के मुख्य अंश।


प्रश्न- रविन्द्र जी, आपको आईएएस बनने का ख्याल कहां से आया यानी इसकी प्रेरणा कहां से मिली?

उत्तर- पिताजी की इच्छा थी कि मैं आईएएस बनूं, बस मैंने उनकी इसी इच्छा को पूरा करने के लिए हर तरह बाधा पार की।

प्रश्न- यह आपका कौनसा प्रयास था?

उत्तर- यह मेरा दूसरा प्रयास था। इससे पहले भी मैं साक्षात्कार तक पहुंचा था, लेकिन अपडेट नहीं होने के कारण निराश होना पड़ा था। इस बार मैंने कड़ी तैयारी के साथ खुद को पूरी तरह अपडेट रखा था।

प्रश्न- आईएएस तक पहुंचने के सफर को थोड़ा विस्तार से बतायें? ताकि जो लोग इस पद को पाने का सपना संजाये हुए हैं, उन्हें कुछ मदद मिल सके।

उत्तर- मुझ पर पारीवारिक जिम्मेदारियां थी। बहनों की शादी करनी थी, इसलिए अधिक संघर्ष करना पड़ा। मैं कहीं से भी कोई कोचिंग वैगरह नहीं ले पाया, हालांकि इसकी कमी भी मुझको महसूस हुई।...मैं बस यही कहना चाहुंगा कि इसमें व्यक्ति को प्रतिदिन अपडेट रहना जरूरी है। साक्षात्कार के दौरान घबराना नहीं चाहिए, किसी प्रश्न का जवाब नहीं आये तो ‘सॉरी’ कहा जा सकता है।

प्रश्न- साक्षात्कार के दौरान आपसे पहला सवाल क्या किया गया?

उत्तर- मुझसे सबसे पहले ई-गवर्नेंस के बारे में पूछा गया था। उसके बाद ग्लोबिंग वार्मिंग व भ्रष्टाचार से संबंधित प्रश्न थे। मैंने सभी प्रश्नों का धर्य पूवर्क जवाब दिया।

प्रश्न- आपने किस विषय से तैयारी की थी?

उत्तर- मैने लोकप्रशासन व भूगोल को अपने विषय के रूप में चुना था।

प्रश्न- आप कोटपूतली शहर से हैं, शहर की व्यवस्था व समस्याओं से वाकिफ हैं, अपने शहर की व्यवस्था या शहरवासियों से कुछ कहना चाहेगें?

उत्तर- मेरी इच्छा है कि कोटपूतली जिला बनें, जिला बनने पर यहां की समस्याऐं का स्वतः ही समाधान होता चला जाएगा। मैं चहता हूं कि गरीब का खास ध्यान रखा जाए...मैं क्षेत्र के लोगोंं से विशेष रूप से जुड़ा रहुंगा।

प्रश्न- आप अपनी सफलता का श्रेय किसे देते हैं?

उत्तर- मेरे इस मुकाम तक पहुंचने में मां आशालता का आशीर्वाद, बहनें रश्मि व ज्योति का समय-समय पर उत्साहवर्धन व पत्नी करूणा का भरपूर सहयोग रहा है। मैं अपनी सफलता इन्हीं को समर्पित करता हूं।

yaad...

यादें याद आती हैं,


तेरे साथ बीता हर लम्हा,

हर पल, हर मुलाकात,

हर बात याद आती है।


कितना भी बदलें अब

हम या तुम

वो सुनसान राहें, पथरीली डगर

रह रहकर याद आती हैं।


वो सूरज की पहली किरण के साथ

घंटो बतियाना तुम्हारे साथ,

हरियल घास की गुदगुदी

याद आती है।


यादें याद आती हैं,

तेरे साथ बीता हर लम्हा,

हर पल, हर मुलाकात,

हर बात याद आती है।

8.5.10

उफ् ये कैसा तंत्र है...?



इंदौर में राजस्थान पत्रिका पर हमले होना, वहां की सरकार और प्रशासन के नकारापन को दर्शाता है, जो अब तक अपराधियों पर नकेल नहीं कस सकी है। यह लोकतंत्र की हत्या का प्रयास है, उस संविधान की हत्या का प्रयास है, जो स्वतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है।...तो फिर अब तक वहां के सामाजिक संगठन, प्रशासन और सरकार किस बात का इंतजार कर रहे हैं, क्या अभी कुछ और होना बाकी है? होना तो यह चाहिए था कि ऐसे समाजकंटकों की नाक में तुरंत नकेल डाल उन्हें एहसास करा देना चाहिए था कि लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ से खिलवाड़ करने की हिमाकत करने पर क्या होता है, फिर राजस्थान पत्रिका तो निर्भिक और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए जानी जाती रही है।...मैं उन चंद राजनेताओं को साधूवाद देता हुं जिन्होंने संसद में सरकार के समक्ष प्रेस की स्वतंत्रता पर हो रहे हमले पर चिंता जाहिर की और जवाब मांगा।...लेकिन दुखः है कि भाजपा आलाकमान अभी तक इस मुद्दे पर चुप हैं।

7.5.10

गौ-शाला की जमीन पर टिकी भू-माफियाओं की नजर

कोटपूतली। शहर के बानसूर रोड़ स्थित गौ-शाला इन दिनों संकट के दौर से गुजर रही है। कारण कि कुछ समाजकंटक लोग यहां दान में आयी जमीन को खुर्द-बुर्द करने में लगे हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से यहां भू-माफिया सक्रिय हो रखे हैं और जमीन पर टेड़ी नजरें गड़ाए हुए हैं। अभी हाल ही यहां गौ-शाला के मुख्य द्वार के सामने की जमीन जो की गौ-शाला को दान में मिली हुई है पर गौ-शाला समिति की ओर से गर्मी में गायों के लिए टीन शेड़ लगवाकर छाया करने हेतु निर्माण कार्य शुरू करवाया गया था, जिस पर कुछ भू-माफियाओं ने अपना हक जताते हुए कार्य बंद करवा दिया?...जबकि समिति के लोगों का कहना है कि उक्त जमीन गौ-शाला की ही है। इस संबध में गौ-शाला समिति के सदस्य रामकंुवार ने बताया कि ‘यहां गायों के लिए टीन-शेड़ लगाकर छाया करने का इंतजाम किया जा रहा था, जिसे कुछ बाहुबली समाजकंटकों ने आकर काम रूकवा दिया। अब हम समिति के सभी लोग इक्ठ्ठा होकर यहां अपनी निगरानी में कार्य करवा रहे हैं। इसी तरह समिति के सरंक्षक हरीशचंद्र चर्तुवेदी व उपाध्यक्ष कैलाशचंद चैकड़ायत व अशोक सुरेलिया ने जानकारी दी।


समिति के संरक्षक ने बताया कि हम गौ-शाला की जमीन को ऐसे ही खुर्द-बुर्द नहीं होने देगें। हम पूरे जी-जान से यहां डटे हुए हैं। जरूरत पड़ी तो कोटपूतली जनता से गौ-शाला बचाओ का आह्नान करेंगे। लेकिन गौ-माता के लिए चारे, पानी व गर्मी में छाया का इंतजाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगे।

समिति के सदस्य व युवा रेवॉल्युशन के अध्यक्ष मनोज चैधरी एवं संयोजक मंयक शर्मा ने भी भू-माफियाओं से डटकर मुकाबला करने की बात कही।

29.3.10

यूं ही नहीं उलझता ट्रेफिक?

हाइवे पर पुलिया निर्माण कार्य के चलते सब्जी मंडी तिराहे से लेकर आरटीएम होटल तक यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। घड़ी-घड़ी जाम और आपस में उलझता ट्रैफिक, व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाता है। ऐसा नहीं है कि व्यवस्था को संभालने या टैªफिक को काबू में करने के लिए कोई मौजूद नहीं रहता है, अगर चैराहों पर थोड़ी देर खड़े रहकर देखें तो ‘हर चैराहे पर 40 से 45 जवान तैनात दिखेगें, लेकिन इनकी उपस्थिति यहां ‘नगण्य -सी’ रहती है।...यानी उपस्थित रहकर भी अनुपस्थित।



कोटपूतली शहर हाइवे के दो-तरफ बसा हुआ है, इसलिए यहां लोकल टैªफिक अधिक रहता है और अधिकतर वाहन शहर के मुख्य चैराहे एवं दीवान रीजेन्सी के सामने सब्जी मंड़ी तिराहे से शहर में प्रवेश करते हैं। यहां व्यवस्था संभालने के लिए प्रशासन ने काफी संख्या में होम गार्ड एवं पुलिस के जवान मुस्तैद कर रखे हैं। लेकिन इनकी हालत ये है कि बिगड़ती व्यवस्था को ये मूकदर्शक बने देखते रहते हैं, यहां तक कि किसी के टोकने पर भी ये किसी को टोकना उचित नहीं समझते...और अगर किसी को टोक लेते हैं तो फिर गाड़ी को कोने में लगवाये बिना नहीं छोड़ते हैं।

ऐसी व्यवस्था के कारण हालात ये रहते हैं कि लोकल टैªफिक तो आपस में उलझता ही है साथ में हाइवे पर भी वाहनों की लम्बी कतार लग जाती है। इसका सीधा और गहरा असर हाइवे किनारे स्थित राजकीय बीडीएम अस्पताल में आने वाले मरीजों पर पड़ रहा है, कारण कि हाइवे जाम हो जाने के बाद छोटे वाहन अस्पताल के सामने की सर्विस लाइन पर आ जाते हैं और अस्पताल में आने-जाने वाले लोगों का रास्ता बंद हो जाता है।

इस चैराहे से उस चैराहे तक बस स्टैण्ड

हाइवे के मुख्य चैराहे से अगले चैराहे तक सड़क किनारे यात्रियों की भारी भीड़ लगी रहती है। यहां ना तो यात्रियों को पता कि बस कहां रूकेगी और ना ही बस चालक को पता होता कि बस कहां रोकनी है। सवारियां चलती बस में ही चढ़ती-उतरती रहती हैं, इससे कभी भी कोई दुघर्टनाग्रस्त हो सकता है। गलती से अगर बस सड़क पर रूक जाती है तो पीछे वाहनों की लंबी कतार लग जाती है। इतना सब कुछ महज बस स्टैण्ड निर्धारित ना होने के कारण हो रहा है।

वाहन पार्किंग भी इसी सड़क पर

यातायात की ऐसी स्थिति के बावजूद यहां सड़क किनारे स्थित विभागों एवं दुकान पर आने वाले लोग अपने वाहन इसी सड़क के किनारे खड़ा देते हैं जिससे भारी वाहनों को गुजरने में परेशानी होती है, और फिर यातायात अधिक धीमा हो जाने के कारण दवाब भी बढ़ता चला जाता है।

उल्टी दिशा में संचालित यातायात


शहर के दीवान होटल के पास से एसबीबीजे बैंक तक हाइवे से सटी कॉलोनियों एवं दुकानदार लोग घूमकर आने की बजाय उल्टी दिशा में ही यातायात संचालन करते हैं, इस कोढ़ में खाज का काम कर रहा है। ...लेकिन इसे रोकने की कोई कौशिश नहीं की जा रही है। इन सबके बीच लोगों में चर्चा रहती है हाइवे पर यातायात संभालने के लिए भारी संख्या में जवान तैनात करने के बाद भी स्थिति ऐसी क्यों है?

आज तुम फिर खफा हो

आज तुम फिर खफा हो मुझसे,


जानता हूँ मैं,

न मनाऊगा तुमको,


इस बार मैं।

तुम्हारा उदास चेहरा,

जिस पर झूठी हसी लिये,

चुप हो तुम,

घूमकर दूर बैठी,

सर को झुकाये,

बातों को सुनती,

पर अनसुना करती तुम,

ये अदायें पहचानता हूँ मैं,

आज तुम फिर खफा हो मुझसे,

जानता हूँ मैं।

नर्म आखों में जलन क्यों है?

सुर्ख होठों पे शिकन क्यों है?

चेहरे पे तपन क्यों है?

कहती जो एक बार मुझसे,

तुम कुछ भी,

मानता मै,

लेकिन बिन बताये क्यों?

आज तुम फिर खफा हो मुझसे,

जानता हूँ मै।।