राजपूताना पी. जी. काॅलेज की राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई प्रथम व द्वितीय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय एन. एस. एस. विशेष शिविर के पांचवें दिन अन्तर सदनीय खेल-कूद प्रतियोगिता के दौरान प्रधान बबिता मीणा ने मुख्य अतिथि पद से स्व्यंसेवकों कों सम्बोधित करते हुए कहा कि खेल व्यक्ति के सर्वांगीण विकास व संस्कृति के पोषक तत्त्व हैं। प्रधान ने कहा कि हमें परस्पर भाई-चारे व सैाहार्द्ध के साथ खेलकर राष्ट्रीय एकता का परिचय देना चाहिए। अध्यक्षता करते हुए संस्था प्राचार्य डाॅ. एच. एन. धोलीवाल ने स्वयंसेवकों से कहा कि खेल हमारी संस्कृति व राष्ट्रीय एकता के सूचक है। कार्यक्रम के बाद प्रधान बबिता मीणा ने महिला कबड्डी प्रतियोगिता का शुभारम्भ किया। कबड्डी (महिला) प्रतियोगिता में ’लक्ष्मीबाई‘ दल विजेता रहा। महिला 100 मीटर दौड़ प्रतियोगिता ग्रुप ’ए‘ में सुमन यादव ,सुशीला व मनीषा यादव तथा ग्रुप ’बी‘ में सुमन गुर्जर, मंजु सैनी व प्रियंका शर्मा ने क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त किया। 200 मीटर महिला दौड़ में सुमन गुर्जर, मंजु सैनी,व ममता सैनी तथा 100 मीटर पुरूष दौड़ प्रतियोगित में शैतान स्वामी, देशराज गुर्जर व महेन्द्र कुमार आर्य ने क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त किया। इसी प्रकार क्रिकेट पुरूष प्रतियोगिता में गु्रप ’ए‘ ने 74 रनों से ग्रुप ’बी‘ पर विजय प्राप्त की। मैन आॅफ दा मैच मोजी राम गुर्जर रहे। इस दौरान उपप्राचार्य सुशील सकलानी, व्याख्याता संजय कुमार, कार्यक्रम अधिकारी द्वितीय रघुनन्दन सैन, अन्जु शर्मा, बबीता मित्तल, शारीरिक शिक्षक धर्मवीर चैधरी, व सैकड़ों स्वयंसेवक मौजूद थे।
किस्मत तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नहीं होते ... कहते हैं हाथों की लकीरों पर भरोसा मत कर , किस्मत तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नहीं होते। जी हां , इस कथनी को करनी में बदल दिया है राजस्थान की कोटपूतली तहसील के नारेहड़ा गांव की 14 वर्षीय मुखला सैनी ने। मुखला को कुदरत ने जन्म से ही हाथ नहीं दिये , लेकिन मुखला का हौसला , जज्बा और हिम्मत देखिए , उसने ‘ करत-करत अभ्यास के जड़मत होत सुजान ’ कहावत को भी चरितार्थ कर दिखाया है , अब वह अपने पैरों की सहायता से वह सब कार्य करती है जो उसकी उम z के अन्य सामान्य बच्चे करते हैं। कुदरत ने मुखला को सब कुछ तो दिया , लेकिन जीवन के जरूरी काम-काज के लिए दो हाथ नहीं दिये। बिना हाथों के जीवन की कल्पना करना भी बहुत कठिन है , लेकिन मुखला ने इसे अपनी नियति मान कर परिस्थितियों से समझौता कर लिया है। हाथ नहीं होने पर अब वह पैरों से अपने सारे काम करने लग गई है। पढ़ने की ललक के चलते मुखला पैरों से लिखना सीख गई है और आठवीं कक्षा में पहुंच गई है। मुखला को पैरों से लिखते देखकर हाथ वालों को भी कुछ कर दिखाने की प्रेरणा लेनी चाहिए...
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